मुख्यमंत्री महोदय, ये कैसी ‘दूरी’ है ? आरटीई का गला घोंटने वाला ‘सरकारी फरमान’ वापस लो !


मुख्यमंत्री महोदय, ये कैसी ‘दूरी’ है ? आरटीई का गला घोंटने वाला ‘सरकारी फरमान’ वापस लो !

मुंबई: महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था में आज जो ‘आरटीई’ (RTE) का नाटक चल रहा है, उसे देखकर स्वर्ग में बैठे महात्मा फुले भी आंसू बहा रहे होंगे! एक तरफ हम ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ का ढोल पीटते हैं, और दूसरी तरफ गरीब के बच्चे के स्कूल और उसके सुनहरे भविष्य के बीच ‘एक किलोमीटर’ की लक्ष्मण रेखा खींच देते हैं। धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर!

दूरी का बहाना, शिक्षा से किनारा..?

ताजा खबर यह है कि सरकार ने आरटीई प्रवेश के लिए ‘एक किलोमीटर’ की ऐसी शर्त मढ़ दी है, जिसे सुनकर आम आदमी का माथा ठनक गया है। मूवमेंट फॉर पीस एंड जस्टिस (MPJ) ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कान खोलते हुए साफ कह दिया है कि हुजूर, कानून में ऐसी किसी दूरी का जिक्र नहीं है! आप प्रशासनिक नियमों की कैंची से बच्चों के कानूनी अधिकारों के पर कतरने की कोशिश न करें।

पारदर्शिता की ‘तेरहवीं’ और स्कूलों की मनमानी.!

,पहले चोर पर नजर रखने के लिए एक पूरी पंचायत (सत्यापन समिति) बैठती थी। अब सरकार ने क्या किया? सीधे चोर के हाथ में ही तिजोरी की चाबी थमा दी! नए फरमान के मुताबिक, अब दस्तावेजों की जांच का अधिकार सीधे निजी स्कूलों को दे दिया गया है। यानी अब बिल्ली ही दूध की रखवाली करेगी? पारदर्शिता का इससे बुरा कत्ल और क्या हो सकता है?

MPJ की सरकार को ‘दो टूक’ चेतावनी :

संगठन ने मुख्यमंत्री को सौंपे ज्ञापन में कुछ चुभते हुए सवाल किए हैं:

हाईकोर्ट की अवमानना क्यों? जब बॉम्बे हाई कोर्ट पहले ही दूरी के इन खोखले प्रावधानों पर उंगली उठा चुका है, तो फिर से वही गलती क्यों दोहराई जा रही है ?

समिति को क्यों हटाया? 20 सदस्यों की स्वतंत्र समिति को हटाकर निजी स्कूलों को ‘सुप्रीम पावर’ क्यों दी गई?

गरीब का बच्चा कहां जाए..? अगर 1 किलोमीटर के दायरे में अच्छा स्कूल न हो, तो क्या उस बच्चे को अनपढ़ रहने की सजा दी जाएगी?

हमारा सवाल..!

प्रशासन की यह ‘दूरी’ वाली नीति दरअसल गरीबों को शिक्षा से ‘दूर’ रखने की एक सोची-समझी साजिश नजर आती है। आरटीई की धारा 12(1)(c) कोई खैरात नहीं, बल्कि बच्चों का संवैधानिक अधिकार है। अगर सरकार ने यह काला सर्कुलर वापस नहीं लिया, तो याद रहे, गरीब की हाय और अभिभावकों का गुस्सा इस सत्ता की कुर्सी को हिलाने के लिए काफी है!

शिक्षा के मंदिर में प्रवेश के लिए किलोमीटर नहीं, काबिलियत और जरूरत देखी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री जी, कलम उठाइए और इस ‘गैर-कानूनी’ पाबंदी को कूड़ेदान के हवाले कीजिए!

 

 


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