वक़्त से बड़ा कोई नहीं : हाजी सुल्तान नाज़ा की कव्वाली हमें क्या सिखाती है?
लेखक: मेहबूब सर्जेखान ( संपादक)
इंसान के जीवन का असली सच क्या है? अगर कोई मुझसे पूछे, तो मैं कहूँगा— हाजी सुल्तान नाज़ा की यह बेमिसाल कव्वाली! हिंदुस्तान के सुप्रसिद्ध कव्वाल अजीज नाज़ा के योग्य शिष्य हाजी सुल्तान नाज़ा ने अपने उस्ताद की उस महान विरासत को न केवल संभाला है, बल्कि उसे सात समंदर पार भी पहुँचाया है। हाल ही में मॉरिशस के सफल दौरे से लौटे हाजी सुल्तान नाज़ा ने वहाँ भी अपनी कव्वाली के ज़रिए इंसानियत और वक़्त की अहमियत का संदेश फैलाया है। यह कव्वाली महज़ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि इंसान के झूठे घमंड को मिट्टी में मिलाने वाला एक आईना है।
१. मुसाफ़िर होने का पहला इशारा
हाजी सुल्तान नाज़ा जब अपने उस्ताद अजीज नाज़ा की उस बुलंद शैली में गाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो समय खुद चिल्लाकर हमें चेतावनी दे रहा हो:
“तू यहाँ मुसाफ़िर है, ये सराए फ़ानी है,
जितनी भी तू कर ले, उतनी ही कम ये ज़िंदगानी है।”
अरे ओ इंसान! तू यहाँ सिर्फ कुछ दिनों का मेहमान है। मॉरिशस हो या हिंदुस्तान, यह दुनिया महज़ एक ठहरने की जगह है, तेरा परमानेंट घर नहीं। तू चाहे जितनी भागदौड़ कर ले, कितनी ही दौलत जमा कर ले, यह ज़िंदगी अंत में कम ही पड़ने वाली है!
२. सत्ता और खूबसूरती का अंत
इंसान को किस बात की अकड़ है? अपने रूप की या अपनी कुर्सी की? हाजी सुल्तान नाज़ा इस भ्रम की धज्जियाँ उड़ा देते हैं:
“ये आज-कल की बात नहीं, ये सदियों की कहानी है,
दुनिया जिसको कहते हैं, वो जादू की एक पिटारी है।”
वे इस शरीर के सच के बारे में आगे कहते हैं कि मिट्टी की है ये काया और एक दिन मिट्टी में ही मिल जाएगी। न कोई ज़ेवर साथ जाएगा और न ही कोई दौलत। तुम चाहे कितने ही हीरे-जवाहरात पहन लो, अंत में इस शरीर को मिट्टी ही होना है। तुम्हारे साथ न तुम्हारी तिजोरी जाएगी और न ही तुम्हारी हुकूमत!
३. मौत का अटल न्याय
इस कव्वाली का सबसे तीखा हिस्सा मौत का वो सच है जिसे कोई झुठला नहीं सकता:
“अजल ने न छोड़ा न राजा न रानी,
यही सब की दुनिया में है एक कहानी।”
‘अजल’ यानी मौत! इसने कभी न किसी राजा को बख्शा और न ही किसी रानी को। अजीज नाज़ा के इन शक्तिशाली शब्दों को जब हाजी सुल्तान नाज़ा अपनी आवाज़ देते हैं, तो पूरी दुनिया के सुनने वालों का दिल दहल जाता है। जिस सिकंदर ने पूरी दुनिया जीतने का सपना देखा था, वह भी खाली हाथ गया। फिर हमारी बिसात क्या है?
४. आख़िरी सबक: चढ़ता सूरज
और फिर वह मुख्य हिस्सा आता है, जिसे सुनकर पत्थर दिल इंसान की आँखों में भी पानी आ जाए:
“चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है, ढल जाएगा,
ढल जाएगा, ढल जाएगा!”
आज जो सूरज सर पर तप रहा है, शाम होते-होते उसे भी झुकना ही होगा। तुम्हारी जवानी, तुम्हारी ताकत, तुम्हारी शोहरत… यह सब वक़्त के साथ खत्म होने वाली चीज़ें हैं।
हाजी सुल्तान नाज़ा ने जिस तरह मॉरिशस की धरती पर हिंदुस्तान की इस रूहानी कव्वाली का जादू बिखेरा, वह काबिले तारीफ है। यह कव्वाली हमें ज़मीन पर रहने का सबक देती है। अहंकार छोड़ो, पैर ज़मीन पर रखो और इंसानियत बचाओ। क्योंकि याद रखना, वक़्त किसी का सगा नहीं होता। कितना भी बड़ा ‘सूरज’ क्यों न हो, उसे एक दिन ढलना ही पड़ता है!
“चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है, ढल जाएगा!”





























